तुम चलो, मैं ज़रा रुक कर के निकलूंगा…
मेरे पैरों में कुछ ज़ंजीरें बंधी हैं
बहुत सी चाबियां इनकी, रखकर कहीं मैं भूल बैठा हूं
ज़रा सा वक्त दो, मैं ढूंढता हूं,
मेरी पेशानी पे कुछ सलवटें उभर आई हैं देखो
अभी कुछ साल पहले तक नहीं थीं
ज़रा सा वक्त दो, मैं पोंछता हूं,
कुछ दिनों से लड़ रहा हूं यूं ही अपने आप से।
हारा नहीं, बस थक गया हूं ज़िन्दगी के ताप से।
ज़रा सा वक्त दो, मैं झाड़ता हूं,
तुम्हारे पूछने से पहले तक मैं बेखबर था।
मैं चलना चाहता हूं, ये कभी सोचा नहीं था।
ज़रा सा वक्त दो, मैं सोचता हूं,
अपनी मर्ज़ी का नहीं है मालिकाना हक़ अभी तक।
लगानी है बहुत सी अर्जियां, मंजूर होने तक।
ज़रा सा वक्त दो, मैं पूछता हूं,
मैं मुसलसल कर रहा हूं कोशिशें सारी,
ये ज़ंजीरें पिघल जाएंगी इक दिन,
ये सारी सलवटें सिमट जाएंगी इक दिन,
मैं अपनी सारी थकन भी झाड़ लूंगा,
अपनी मर्ज़ी का खुदमुख्तार हो जाऊंगा इक दिन।
मैं चलूंगा,
मुझे तुम वक्त दे दो बस ज़रा सा
और तब तक, तुम चलो,
मैं ज़रा रुक कर के निकलूंगा।

