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Sector 64, Noida

Tum jab aana

Lalit Kumar Pandey
मैं बादलों में रख के बारिशें अपनी, भूल गया हूं, एक गुलाब किताबों में रख के कहीं भूल गया हूं। कुछ आवारा दिन, कुछ महकती शामें, तुम्हारे दुपट्टे से बांधी थी कभी, सोचा था कि खोलूंगा, मगर भूल गया हूं। गेसुओं में फंसा के जो रक्खा था ना तुमने, वो कलम थी मेरी जां, मैं वहीं भूल गया हूं। तुम्हारी समन्दर सी आंखों में, उतरा था कभी जो डूब गया दिल, मैं उसे भूल गया हूं। तुमसे बिछड़ा था तो, वादे मैं कई कर के चला था, पहुंचा जो शहर तो वो वादे, मैं सभी भूल गया हूं। तुम न कहती थी कि, “तू हंसता है बहुत”, मानोगी नहीं सच, मैं हंसी भूल गया हूं। सुनो, कि अब मैं हो गया हूं समझदार बहुत, कर के नादानियां कई, मैं कई भूल गया हूं। तुम जब आना अबके सावन में, तो लेती आना, वो सब कुछ जो, मैं रख के कहीं भूल गया हूं।