कुछ तुमने कहा था अभी-अभी,
मैं न सुन सका, ज़रा फिर कहो।
यूं ही गुम था किसी ख़याल में,
उलझा था एक सवाल में,
फिर और ही कहीं चल दिया,
कुछ सोच में, विचार में,
खुद से ही एक बहस में मैं,
हार जीत के बीच में,
कभी इस तरफ, कभी उस तरफ।
मैं बैठे-बैठे इसी जगह,
कई मोर्चों पे था लड़ रहा,
नहीं, ऐसा मुझे कोई ग़म नहीं,
बस गुज़रते हुए एक ख़याल से,
जो उलझ गया तो ये सिलसिले,
यूं ही दर-बदर मुझे ले चले।
हां, जो बात तुमने कही थी ना,
मैं न सुन सका, ज़रा फिर कहो।

