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Yun aadat ho gayi hai gham-e-zindagi hum ko

Bhumit Tehlan
यूं आदत हो गई है ग़म-ए-ज़िंदगी हमको, कि अजीब लगने लगी है तमन्ना-ए-ख़ुशी हमको। तुम्हें देख लिया है जी भर के यादों में, अब तमन्ना-ए-रोशनी भी नहीं रही हमको। सूखी लगने लगी हैं जहाँ भर की आँखें, सोखने नहीं देती हमारी नमी हमको। मैं हर सांस के बाद एक तकलीफ़ महसूस करता हूँ, ख़ैर, तुम खुश हो किसी और के साथ, सुनकर हुई ख़ुशी हमको। कितना अजीब वाक़िया हुआ देखो, उसको खोने का डर रहा जो मिला ही नहीं हमको। मिलेंगे उनसे मौत से पहले एक बार लेकिन, अभी उनके ख़यालों से न जगाए कोई हमको।