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Kuchh soch raha tha

Lalit Kumar Pandey
अपने बिस्तर पर अधनंगा लेटा हुआ मैं ये सोच रहा हूं कि ज़माने भर में हो रहे हर ज़ुल्म के खिलाफ एक बगावत शुरू करूं। कलम की धार पैनी करूं और चिंगारियां लिखूं। बातों से अगर बात न बने तो कुल्हाड़ियां तेज़ करूं, दराज़ से निकालूं पुरानी बन्दूकें और कारतूस भरूं या फिर एक बड़ा सा छुरा लेकर सड़क पर निकल पडूं। साइड टेबल से गर्म चाय का प्याला उठा कर चुस्कियां लेते हुए कुछ और सोचने से पहले, तलब हुई कि बेकरी के कुछ नमकीन बिस्कुट अगर होते सो मंगवा लिए एक आवाज़ देकर। सोचने का ये सिलसिला कुछ देर और चला चाय और बिस्कुट अब तक खत्म हो चुके थे मैं भी सोचते-सोचते थक चुका था। फिर एक-दो लम्बी उबासियां ली और सो गया। सोने से कुछ देर पहले तक अपने बिस्तर पर अधनंगा लेटा हुआ मैं, कुछ सोच रहा था